Thursday, October 22, 2020
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    लद्दाखी नेताओं ने हिल काउंसिल चुनाव के बहिष्कार का आह्वान वापस लिया

    नई दिल्ली, 27 सितंबर (आईएएनएस) लद्दाख के वरिष्ठ नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने आगामी 16 अक्टूबर को तय किए गए लद्दाख ऑटोनोमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल (एलएएचडीसी) के चुनावों के बहिष्कार के आह्वान को वापस लेने पर सहमति जताई है। यह फैसला उन्होंने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद लिया।

    प्रतिनिधिमंडल ने इन चुनावों के सुचारु संचालन के लिए पूर्ण समर्थन का भी वादा किया है।

    गृह मंत्रालय (एमएचए) के अधिकारी ने कहा, प्रतिनिधिमंडल को आश्वासन दिया गया था कि लद्दाखी भाषा, जनसांख्यिकी, जातीयता, भूमि और नौकरियों से संबंधित सभी मुद्दों पर सकारात्मक रूप से विचार किया जाएगा और उनका ध्यान रखा जाएगा।

    अधिकारी ने आगे कहा, छठी अनुसूची के तहत पीपुल्स मूवमेंट फॉर कॉन्स्टीट्यूशनल सेफगार्ड के तत्वावधान में लेह और कारगिल जिलों के प्रतिनिधियों सहित बड़े लद्दाखी प्रतिनिधिमंडल और गृह मंत्रालय के बीच संवाद एलएएचडीसी चुनाव के समापन के 15 दिन बाद शुरू होगा।

    उन्होंने आगे कहा, बातचीत के बाद कोई भी फैसला लेह और कारगिल के प्रतिनिधियों के परामर्श से लिया जाएगा।

    लद्दाख के लोगों की ओर से वरिष्ठ लद्दाखी नेताओं थिकसे रिनपोछे (पूर्व राज्यसभा सांसद), थुपस्टन छेवांग (पूर्व लोकसभा सांसद) और छेरिंग दोर्जी (जम्मू और कश्मीर के पूर्व मंत्री) ने शनिवार को शाह से यहां उनके आवास पर मुलाकात की।

    गृह राज्यमंत्री जी. किशन रेड्डी और युवा मामलों और खेल राज्यमंत्री किरेन रिजिजू भी इस दौरान मौजूद थे।

    गृहमंत्री ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वासन दिया कि केंद्र सरकार लेह और कारगिल के एलएएचडीसी को सशक्त बनाने और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश के लोगों के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।

    उन्होंने कहा, वे इस उद्देश्य के लिए सभी रास्तों पर विचार करेंगे।

    एक अन्य अधिकारी ने कहा कि केंद्र सरकार लद्दाख के लोगों से संबंधित मुद्दों को देखते हुए भारत के संविधान की 6वीं अनुसूची के तहत उपलब्ध संरक्षण पर चर्चा करने के लिए स्वागत करती है।

    गौरतलब है कि इससे पहले लद्दाख ने इस क्षेत्र की जनसांख्यिकी, पर्यावरण और विविधता को सुरक्षित रखने के लिए एलएचडीसी चुनावों के बहिष्कार की घोषणा की थी।

    सर्वोच्च निकाय पीपुल्स मूवमेंट फॉर सिक्स्थ शेड्यूल फॉर लद्दाख के तहत यह निर्णय लिया गया कि एलएचडीसी चुनावों का बहिष्कार तब तक किया जाएगा, जब तक बोडो टेरिटोरियल काउंसिल की तर्ज पर छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा की रक्षा नहीं की जाती।

    संविधान की छठी अनुसूची (अनुच्छेद 244 (2) और 275 (1)) आदिवासी आबादी की रक्षा करती है और स्वायत्त विकास परिषदों (एडीसी) के निर्माण के माध्यम से कमजोर समुदायों को काफी स्वायत्तता प्रदान करती है।

    असम, त्रिपुरा, मेघालय और मिजोरम के कुछ भाग इसके अंतर्गत आते हैं।

    यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि ईसाइयों, मुस्लिमों और बौद्ध समुदायों से धार्मिक निकाय सहित सर्व-शक्तिशाली लद्दाख बौद्ध संघ ने विरोध को अपना समर्थन दिया था।

    इस विशिष्ट मांग पर भारतीय जनता पार्टी सहित सभी राजनीतिक दल एक साथ आ गए थे।

    पिछले साल अगस्त में केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 370 और 35ए को निरस्त कर दिया और लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश बनाने के लिए जम्मू एवं कश्मीर राज्य का विभाजन कर दिया।

    एक ओर जहां लद्दाखी खुश थे, वहीं वे दो कारणों से अपने भविष्य को लेकर आशंकित भी थे। सबसे पहला यह कि केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा एक विधायिका के बिना आया, जो इस क्षेत्र से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए लोकतांत्रिक रूप से चुने गए एलएएचडीसी को प्रभावी ढंग से लेकर आया।

    वहीं एक खतरा, आदिवासी के रूप में चिह्न्ति 97 फीसदी क्षेत्र में भूमि या रोजगार की गारंटी के बिना लद्दाखियों के अल्पसंख्यक में कमी आने का था।

    दूसरा, केंद्र सरकार द्वारा नागरिकता (संशोधन) अधिनियम की घोषणा के बाद, धार्मिक रूप से विविध लोग सांप्रदायिक विभाजन के बारे में आशंकित थे।

    हालांकि उन्होंने इंतजार करने का फैसला किया कि सरकार क्या करेगी। भारत के पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ कोविड-19 महामारी और तनाव का सामना करने के बावजूद एलएएचडीसी चुनाव स्थगित नहीं किए गए थे। केंद्र सरकार ने लोगों की इच्छा की परवाह किए बिना चुनावों को आगे बढ़ाने का फैसला किया।

    एमएनएस/एसजीके



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